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जाने FIR दर्ज करवाते समय या FIR एप्लीकेशन लिखते समय किन बातों का ध्यान दे।

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नमस्कार मित्रों,
आज के इस लेख में आप सभी को यह बताने जा रहा हु कि "FIR दर्ज करवाते समय या FIR दर्ज करवाने के लिए लिखी जाने वाली एप्लीकेशन में क्या लिखे और क्या ध्यान देना है"


जब किसी भी व्यक्ति के साथ कोई भी आपराधिक घटना जैसे कि चोरी, लूट, हत्या, अपरहरण, धमकी, प्रताड़ना, बलात्कार जैसे गंभीर से गंभीर अपराध के घटित होने पर पीड़ित व्यक्ति सबसे पहले प्राथमिक उपचार पर ध्यान देता है उसके तुरंत बाद FIR यानी प्रथम सूचना रिपोर्ट  दर्ज कराते। यह FIR पीड़ित / पीड़िता स्वयं या उसके परिवार के सदस्य, रिश्तेदार या मित्रों द्वारा भी दर्ज कराई जा सकती है। 

अपराधी को सजा दिलाने व् पीड़ित / पीड़िता को न्याय मिले उसके लिए पीड़ित / पीड़िता द्वारा पहला चरण FIR दर्ज कराना होता है।  अब FIR दर्ज कराने के लिए घटना की सूचना चाहे लिखित दी जाये या मौखिक यानी घटना कि सूचना बोलकर दी जाये। पुलिस थाना अध्यक्ष का कर्तव्य है आपराधिक घटना की सूचना मिलते ही FIR दर्ज की जाये और रिपोर्ट की एक कॉपी निःशुल्क शिकायतकर्ता को दी जाये।  

FIR दर्ज करवाते समय या FIR दर्ज करवाने के लिए लिखी जाने वाली एप्लीकेशन में क्या लिखे और क्या ध्यान देना है

जाने FIR दर्ज करवाते समय या FIR एप्लीकेशन लिखते समय किन बातों का ध्यान दे। 


अपराधी को सजा दिलाने के लिए पहला चरण FIR - प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कराना होता है, तो क्या, कैसे लिखना है या लिखवाते समय क्या बोलना है, विस्तार से जाने। 
  1. थाने का नाम,
  2. रिपोर्ट का विषय,
  3. शिकायतकर्ता का नाम,
  4. घटना कारित करने वालो के नाम,
  5. घटना की सूचना,
  6. समय,
  7. स्थान,
  8. अपराध की प्रकृति,
  9. चोटों की प्रकृति,
  10. हथियार का प्रकार। 
इन सभी को विस्तार से समझे की इनमे लिखना क्या होगा। 

1. थाने का नाम।  
  1. यदि किसी भी अपराध के सम्बन्ध में सूचना लिखित रूप में दी जा रही है, तो शिकायतकर्ता को अपने नजदीकी  उस थाने का नाम लिखना होगा जिस थाने में वह अपराध के सम्बन्ध में FIR दर्ज कराने के लिए सूचना दे रहा है। 
  2. यदि शिकायतकर्ता को अपने नजदीकी थाने का नाम नहीं मालूम या लिखित में सूचना नहीं दे सकता, तो वह थाने में जाकर वहाँ पर थाना अध्यक्ष से अपराध के संबंध में सूचना देकर मौखिक रूप से FIR दर्ज करा सकता है। 
2. रिपोर्ट का विषय। 
रिपोर्ट का विषय से मतलब यह है की जिस अपराध के सम्बन्ध में लिखित सूचना दी जा रही है उसका विषय क्या है। यानी किस अपराध के घटने के सम्बन्ध में शिकायतकर्ता द्वारा सूचना दी जा रही। जैसे कि :-
  1. चोरी,
  2. लूट,
  3. मारपीट,
  4. हत्या,
  5. अपरहरण,
  6. बलात्कार,
  7. धमकी,
  8. अन्य आपराधिक कार्य। 
3.शिकायतकर्ता का नाम। 
FIR लिखवाने के लिए दी जाने वाली एप्लीकेशन में शिकायतकर्ता का नाम स्पष्ट व् सही लिखा जाना चाहिए। यहाँ शिकायतकर्ता से मतलब पीड़ित / पीड़िता के नाम से है, जो किसी आपराधिक घटना का शिकार हुआ होता है। CRPC की धारा 154 में शिकायतकर्ता स्वयं पीड़ित व्यक्ति या उसके परिवार, रिश्तेदार या मित्र भी हो सकते है। लेकिन ऐसा बहुत ही कम देखने को मिलता है, अधिकतर FIR दर्ज कराने के लिए दी जाने वाले आवेदनपत्र में शिकायतकर्ता के नाम की जगह पीड़ित व्यक्ति का ही नाम होता है। 

4. घटना कारित करने वाले / वालों का नाम। 
प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कराने का मुख्य उद्देश्य केवल अपराध कारित करने वाले / वालों को न्यायालय से दण्डित कराना होता है। फौजदारी के मुकदमों में FIR की एक अहम भूमिका होती है। यह महत्वपूर्ण होता है कि किसी भी अपराध में शामिल, अपराध को कारित करने या अपराध में लगे हुए व्यक्ति या व्यक्तियों के नाम FIR दर्ज कराने वाले आवेदनपत्र में लिखा जाना अति आवश्यक होता है। क्योकि जो सूचना आप FIR आवेदनपत्र में लिखते या मौखिक बोलते है,वही FIR रिपोर्ट में लिखी जाती है। इसी रिपोर्ट के आधार पर व्यक्तियों की गिरफ़्तारी, होती है । 

5. घटना की सूचना। 
घटना की सूचना से मतलब अमुक अपराध के किये जाने के सम्बन्ध में वह सम्पूर्ण जानकारी जो अपराध के होने से सम्बंधित होती है। 
जैसे चोरी, लूट, अपरहरण, हत्या जैसे अन्य अपराध हुए तो कैसे मालूम चला। घटना की सूचना यानी अपराध के घटिति होने की जानकारी होती है।  इसी जानकारी के आधार पर अपराध कारित करने वालों के ऊपर FIR में धाराओं का उल्लेख  किया जाता है। 

6. समय व् दिन। 
FIR दर्ज कराते समय, अपराध के घटित होने का समय व् दिन क्या था, यह लिखा जाना अत्यधिक महत्वपूर्ण होता है। पीड़ित व्यक्ति को न्याय दिलाने में समय व् दिन की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्व होती  है। 

7. स्थान।
FIR दर्ज कराते समय घटना के घटित होने का स्थान क्या था ? इसका जिक्र स्पष्ट रूप से किया जाना चाहिए। घटना के घटित होने के स्थान से मतलब है कि जो अपराध हुआ वो कहाँ पर हुआ जैसे कि :-
  1. सड़क,
  2. घर,
  3. मोहल्ला,
  4. कॉलेज,
  5. स्कूल,
  6. कार्यालय,
  7. बैंक,
  8. कंपनी,
  9. फर्म,
  10. फैक्ट्री,
  11. बाजार,
  12. पार्क,
  13. अन्य स्थान। 
8. अपराध की प्रकृति। 
FIR दर्ज कराते समय अपराध की प्रकृति का लिखा जाना आवश्यक होता है। जिससे पुलिस को अपराध का पता चलता है कि घटित अपराध क्या था। अपराध की प्रकृति से मतलब अपराध किस प्रकार का था जैसे  कि :-
  1. चोरी,
  2. लूट,
  3. डकैती,
  4. अपहरण,
  5. हत्या,
  6. धमकी,
  7. हमला,
  8. मारपीट,
  9. बलात्कार,
  10. अन्य संज्ञेय व् असंज्ञेय अपराध। 
9. चोटों का प्रकार। 
FIR दर्ज कराते समय पीड़ित व्यक्ति की चोटों का जिक्र किया जाना अति आवश्यक है। चोट मामूली है या गंभीर उसके आधार पर मेडिकल होता है व् अपराध करने वाले व्यक्ति पर कानूनी धाराएं लगती है, इन्ही धाराओं के आधार पर दण्डित किये जाने का प्रावधान है। 
चोटें जैसे कि :-
  1. चीरे की चोट,
  2. खरोंच की चोट,
  3. नीलगूं चोट,
  4. छिद्रित चोट,
  5. शरीर के किसी भाग में कटने का घाव ,
  6. शरीर के किसी भाग की हड्डी का टूट जाना,
  7. गोली लगने की चोट,
  8. अन्य चोटें। 
10. हथियार का प्रकार। 
किसी भी घटना में हथियार का उपयोग किया गया है, तो FIR दर्ज कराते समय हथियार का प्रकार लिखा जाना अति आवश्यक है। जिससे यह मालूम चलता है कि पीड़ित व्यक्ति को किस हथियार से चोटे व् घाव आये है और उसके द्वारा बताये जाने वाली चोट क्या उसी हथियार से लगी जिसका वो जिक्र FIR में कर रहा है या वो झूठ तो नहीं बोल रहा है। झूठ बोलने का लाभ विपक्ष के वकील को भी मिलता है। हथियार का प्रकार जैसे कि :-
  1. चाकू,
  2. भाला,
  3. बरछी,
  4. डंडा, लाठी,
  5. बन्दूक,
  6. नोक धार हथियार,
  7. अन्य हथियार। 
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