नमस्कार मित्रों,
आज के इस लेख में हम जानेंगे कि " अगर कोई महिला किसी पुरुष पर झूठा केस करती है तो पुरुष के पास क्या अधिकार है ? " महिलाओं के साथ होने वाले अपराधों की रोकथाम और अपराधियों को दण्डित किये जाने के लिए महिलाओं से सम्बंधित कई कानून बने , ताकि महिलाओं के साथ होने वाले अपराधों से इनको सुरक्षित किया जाये। भारत देश में महिलओं की सुरक्षा के लिए कड़े कड़े कानून पारित किये गए है जैसे कि :-
- भारतीय नागरिक संहिता।
- दहेज़ निषेध अधिनियम।
- घरेलु हिंसा अधिनियम।
- अन्य कानून।
अगर कोई महिला इन कानूनों या अन्य किसी भी कानूनों का दुरूपयोग कर किसी पुरुष पर दहेज़, घरेलु हिंसा, यौन उत्पीड़न, या अन्य किसी अपराध के किये जाने का झूठा आरोप लगाकर आपराधिक मुकदमा दर्ज करा देती है , तो ऐसे में पुरुष के पास कानूनी अधिकार और उपाय है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14 कानून की समता का अधिकार प्रदान करता है, जिसके तहत शिकायतकर्ता के अधिकारों की रक्षा के साथ साथ आरोपी व्यक्ति के अधिकारों की रक्षा होती है। प्रत्येक व्यक्ति को कानून के समक्ष अपनी बात रखने का पूर्ण अधिकार है और आरोपित व्यक्ति को अपनी बेगुनाही संबित का पूर्ण अधिकार है।
अगर कोई महिला किसी पुरुष पर झूठा केस करती है तो पुरुष के पास क्या अधिकार है ?
अगर कोई महिला किसी पुरुष पर झूठा केस करती है तो ऐसे पुरुष के पास अधिकार व्नि उपाय निम्न है :-
- जमानत ( bail )
- झूठी FIR को रद्द करवाना।
- दंडात्मक कार्यवाही के लिए वाद।
इन सभी को विस्तार से समझते है।
1. जमानत ( bail )
आपराधिक मुकदमा दर्ज होने पर न्यायालय की तरफ से समन / नोटिस प्राप्त होने पर प्रार्थी / अभियुक्त को अपनी जमानत करवानी चाहिए। जमानत के लिए आवेदन उस तिथि को न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया जाये जो तारीख समन / नोटिस में लिखी होती है कि अभियुक्त इस तारीख को न्यायालय के समक्ष हाजिर हो अपने पक्ष में साक्ष्य प्रस्तुत करें।
जमानत के लिए प्रार्थी / अभियुक्त को 2 जमानतदार की आवश्यकता पड़ती है और मुचलका यानी न्यायालय द्वारा निर्धारित एक ऐसी धनराशि जो प्रार्थी / अभियुक्त की ओर से जमानत राशि के रूप में देय होती है, अक्सर इस राशि में वाहन का पंजीकरण प्रमाण पत्र, खतौनी या अन्य मूलयवान वस्तु के दस्तावेज़ दाख़िल होते है।
जमानत के मुख्य प्रकार है :-
- साधारण जमानत - जो कि प्रार्थी /अभियुक्त की पुलिस गिरफ़्तारी के बाद / न्यायालय में आत्मसमपर्ण कर ली जाती है।
- अग्रिम जमानत - जो कि प्रार्थी / अभियुक्त स्वयं की गिरफ़्तारी से पूर्व ही न्यायालय में जमानत की अर्जी प्रस्तुत कर अग्रिम जमानत प्राप्त करता है।
- अंतरिम जमानत - जो कि प्रार्थी / अभियुक्त आपराधिक वाद की सुनवाई तक जब तक अंतिम निर्णय नहीं हो जाता जमानत प्राप्त करता है।
जमानत मिलना या न मिलना निर्भर करता है अपराध की प्रकृति, गंभीरता और न्यायालय के विवेक पर, की प्रार्थी / अभियुक्त को जमानत पर रिहा करना उचित है या नहीं।
जमानत मिलने पर प्रार्थी / आरोपी को शर्तों का पालन करना होता है :-
- न्यायिक कार्यवाही में सहयोग करना।
- तारीख पेशी में हाजिर होना।
- साक्ष्यों के साथ छेड़खाड़ न करना।
- पीड़ित को डराना , धमकाना नहीं।
2. झूठी FIR को रद्द करवाना।
यदि आपके विरुद्ध किसी ने प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करवा दी है , और आपके पास उचित साक्ष्य है कि जो प्रथम सूचना रिपोर्ट आपके विरुद्ध दर्ज है वह झूठी है , तो ऐसे में प्रार्थी झूठी FIR को रद्द करवाने हेतु अपने राज्य के उच्च न्यायालय के समक्ष भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 की धारा 528 के अधीन याचिका दायर कर सकते है।



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