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कब सिविल वाद में दिए गए स्थगन पत्र को न्यायालय अस्वीकार स्वीकार नहीं करेगा ?

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ननमस्कार मित्रों,
आज एक इस लेख में आप सभी को बताने जा रहा हु कि "कब सिविल वाद में दिए गए स्थगन पत्र यानी मौका / समय मांगे जाने के लिए दिया गया प्रार्थना पत्र न्यायालय स्वीकार नहीं करेगा " इसी के बारे में हम  विस्तार से जानेगे।  

सिविल प्रक्रिया संहिता 1908 के आदेश 17 में स्थगन यानी वाद की कार्यवाही को किन्ही चरण में पर्याप्त कारणों के आधार पर लिखित दिए गए प्रार्थना पत्र के जरिये वाद से सम्बंधित की जाने वाली कार्यवाही को रोके कर समय मांगे जाने के सम्बन्ध में प्रावधान किया गया है। 

जहाँ वाद की कार्यवाही किन्ही चरणों में रोके जाने यानी समय मांगे जाने के पर्याप्त कारण लिखित रूप में न्यायालय के समक्ष वाद के किसी भी पक्षकार के अधिवक्ता के जरिये दाखिल किये जाते है, तो बताये गए पर्याप्त कारण ऐसे होने चाहिए जो वाद के वादी / प्रतिवादी या अधिवक्ता के नियंत्रण से बाहर हो।  

अब मुख्य सवाल यह आता है कि :-

किन परिस्थितियों न्यायालय सिविल वाद में दिए गए स्थगन यानी समय / मौका मांगे जाने वाले प्रार्थना पत्र को स्वीकार नहीं करेगा ?



किन परिस्थितियों न्यायालय सिविल वाद में दिए गए स्थगन यानी समय / मौका मांगे जाने वाले प्रार्थना पत्र को स्वीकार नहीं करेगा ?

सिविल प्रक्रिया संहिता 1908 के आदेश 17 नियम 1 के तहत मौका मांगे जाने हेतु दिया गया प्रार्थना पत्र यदि वाद की सुनवाई के चरण के दौरान 3 बार से अधिक वाद के किसी भी पक्षकर के अधिवक्ता के जरिये दिया जाता है तो न्यायालय ऐसे दिए गए प्रार्थना पत्र को अस्वीकार कर आदेश 17 नियम 3 के प्रावधान के अनुसार वाद कार्यवाही को जारी रखेगा। 

अब आदेश 17 नियम 3 में दिए गए प्रावधान को भी जानना आवश्यक है, जो की निम्न प्रकार से है :-

आदेश 17 नियम 3 :- पक्षकारों में से किसी पक्षकार के साक्ष्य आदि पेश करने में असफल रहने पर न्यायालय आगे कार्यवाही कर सकेगा। 

जहाँ वाद के किसी ऐसे पक्षकार यानी वादी या प्रतिवादी को अपना साक्ष्य प्रस्तुत करने के लिए या अपने साक्षियों को न्यायालय के समक्ष हाजिर कराने के लिए या वाद की कार्यवाही को आगे बढ़ाने के लिए किसी आवश्यक को कार्य करने के लिए मांगे गए समय की अनुमति न्यायालय द्वारा स्वीकार कर ली जाती है फिर भी मांगे गए समय अवधि के भीतर पक्षकार इन कार्यो को करने में असफल रहता है, तो वहाँ न्यायालय ऐसी असफलता के होते हुए भी वाद से सम्बंधित आगे की कार्यवाही कर सकेगा। 
  1. यदि वाद के पक्षकार वाद की कार्यवाही में हाजिर हो तो वाद को निर्णय की कार्यवाही को न्यायालय चालू रखेगा। 
  2. यदि वाद के पक्षकरों या उनमे से कोई भी पक्ष वाद की कार्यवाही में हाजिर नहीं होता है तो नियम 2 के अधीन वाद की कार्यवाही को न्यायालय चालू रखेगा। 
आदेश 17 नियम 2 को समझे :-
न्यायालय ऐसे हर एक मामले में वाद से सम्बंधित की जाने वाली  कार्यवाही में वाद की सुनवाई के लिए अगली तारीख पेशी नियत करेगा और ऐसे स्थगन यानी वाद की सुनवाई रुकने के कारण हुए खर्चे के संबंध में न्यायालय ऐसा आदेश कर सकेगा जैसा वह ठीक समझे। 

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