बंदी प्रत्यक्षीकरण (habeas corpus) याचिका क्या है और ये कब जारी की जाती हैं।

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 बंदी प्रत्यक्षीकरण (habeas corpus) याचिका क्या है और ये कब जारी की जाती हैं। 
बंदी प्रत्यक्षीकरण (habeas corpus) याचिका क्या है और ये कब जारी की जाती हैं।

बंदी प्रत्यक्षीकरण (habeas corpus) का शाब्दिक अर्थ है कि "बंदी  व्यक्ति को न्यायालय के समक्ष पेश करो।" केरल राज्य बनाम अब्दुल्ला , AIR 1965 SC 1585 के एक वाद में उच्चतम न्यायालय ने यह कहा कि बंदी प्रत्यक्षीकरण (habeas corpus) रिट एक आदेश के रूप में उन व्यक्तियों के विरुद्ध जारी की जाती है जिसने किसी दूसरे व्यक्ति को बंदी  बना रखा है। इस बंदी प्रत्यक्षीकरण (habeas corpus) रिट के द्वारा उन्हें  यह आदेश दिया जाता है कि बंदी व्यक्ति को न्यायलय के समक्ष प्रस्तुत किया करे  और यह पूछा जाता है कि  उस व्यक्ति को किस आधार पर बंदी बनाया गया हैं।  यदि बताये हुए कारणों से ज्ञात होता है कि उस व्यक्ति को निरुद्ध किये जाने का कोई कानूनी औचित्य नहीं है, तो न्यायालय उसे तत्काल प्रभाव से रिहा किये जाने का आदेश पारित करता है।

शुरुवात में रिट की याचिका के अन्तर्गत बंदी व्यक्ति को न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करना एक आवश्यक शर्त थी, लेकिन अब विधि का विकास इस दिशा में हुआ है कि बंदी प्रत्यक्षीकरण (habeas corpus)  रिट में बंदी व्यक्ति को सशरीर प्रस्तुत किया जाना जरुरी नहीं हैं।
कनु सान्याल बनाम जिला मजिस्ट्रेट दार्जलिंग ,AIR 1974 SC 510 के वाद में उच्चतम न्यायालय ने यह निर्णय दिया कि बंदी प्रत्यक्षीकरण (habeas corpus)  रिट के अन्तर्गत बंदी व्यक्ति को न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करना आवश्यक नहीं हैं।

बंदी प्रत्यक्षीकरण (habeas corpus)  रिट  महत्त्व क्या हैं।  
बंदी प्रत्यक्षीकरण (habeas corpus)  रिट का सबसे बड़ा महत्त्व यह कि व्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार पर तुरंत विचार किया जाता  हैं।  भारत में बंदी बनाना विधिविरुद्ध हो सकता है यदि यह कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार नहीं हैं।  भारतीय संविधान के अनुछेद 21 के अनुसार कोई व्यक्ति अपने प्राण और दैहिक स्वतंत्रता से कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही वंचित किया जा सकता हैं अन्यथा नहीं। 
भारतीय संविधान के अनुछेद 22 के अनुसार किसी व्यक्ति को जो कैद किया गया है, कैद होने के 24 घंटे के अंदर उस व्यक्ति को मजिस्ट्रेट के समक्ष   प्रस्तुत किया जाना अनिवार्य हैं। 

बंदी प्रत्यक्षीकरण (habeas corpus)  रिट जारी करने के आधार।  
बंदी प्रत्यक्षीकरण (habeas corpus)  रिट किसी भी अवैध निरोध (Detention)  के खिलाफ जारी की जाती है।  जिसका मतलब यह है कि किसी व्यक्ति को विधिविरुद्ध बंदी नहीं बनाया जा सकता है। चाहे यह निरोध (Detention) दीवानी हो , या राजस्व हो या फौजदारी इस सभी मामलो में बंदी प्रत्यक्षीकरण (habeas corpus)  रिटजारी की जा सकती है।

बंदी प्रत्यक्षीकरण (habeas corpus)  रिट न केवल राज्य के खिलाफ बल्कि यह किसी भी व्यक्ति या प्राधिकारी (Authority)के खिलाफ जारी की जा सकती हैं जिसने किसी भी व्यक्ति को कानून की प्रक्रिया के विरुद्ध बंदी बना कर रखा हैं।  बंदी प्रत्यक्षीकरण (habeas corpus)  रिट की एक और विशेषता  यह कि यह किसी भी व्यक्ति के खिलाफ व्यक्तिगत हैसियत से भी जारी की जा सकती  हैं।

बंदी प्रत्यक्षीकरण  रिट (habeas corpus)  जारी  करने के आधार। 
  1. याची (वह व्यक्ति जो बंदी है) को बंदी या अभिरक्षा में होना चाहिए।  
  2. एक ही प्रार्थना पात्र बार बार नहीं  दिया जाना चाहिए।  
  3. किसी भी व्यक्ति की गिरफ़्तारी बिना औपचारिकताओ  के साथ की गयी हो।  
  4. गिरफ़्तारी का आधार गलत हो  या हुलिया और गिरफ़्तारी की  जगह गलत हो। 
  5. यह साबित हो कि गिरफ्तार करने वाला प्राधिकारी बंदी द्वारा किये गये कार्य को गैरकानूनी समझने में पूरी तरह से सन्तुष्ट नहीं था।  
  6. बंदी बनाये जाने का आधार अनिश्चित हो। 
आवेदन कौन कर सकता है। (Who can apply)
सामान्यतया किसी भी रिट के लिए याचिका उसी व्यक्ति द्वारा प्रस्तुत की जाती है जिस व्यक्ति के अधिकारों का अतिक्रमण होता हैं लेकिन बंदी प्रत्यक्षीकरण  रिट (habeas corpus)  बंदी व्यक्ति के अतिरिक्त उसके संरक्षक , नाते -रिस्तेदार  या अन्य कोई व्यक्ति भी जो बंदी व्यक्ति की स्वतंत्रता में हितबद्ध हो इन सभी व्यक्तियों के द्वारा दायर की जा सकती हैं।  


बंदी प्रत्यक्षीकरण (habeas corpus) याचिका क्या है और ये कब जारी की जाती हैं।  बंदी प्रत्यक्षीकरण (habeas corpus) याचिका क्या है और ये कब जारी की जाती हैं। Reviewed by Lawyer guru ji on गुरुवार, अक्तूबर 12, 2017 Rating: 5

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