नैसर्गिक न्याय के चार सिद्धान्त।(Four principles of natural justice)

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नैसर्गिक न्यायके चार सिद्धान्त।(Four principles of natural justice) 
नैसर्गिक न्याय के चार सिद्धान्त।(Four principles of natural justice)

नैसर्गिक न्याय के चार सिद्धांत का मतलब यह की  अगर  किसी भी व्यक्ति के खिलाफ कोई कार्यवाही होती है , तो उस कार्यवाही पे आदेश करने से पहले उस व्यक्ति को यह अवसर प्रदान करना चहिए कि वह अपने पक्ष के समर्थन में सबूत और तर्क प्रस्तुत कर सके, उसे सुनवाई का मौका दिया जाये ताकि उस व्यक्ति को उचित और पक्षपातरहित न्याय मिले।    

 नैसर्गिक न्याय के सिद्धांत में चार नियम है वे इस प्रकार है।  
  1.  कोई भी व्यक्ति अपने ही मामले में न्यायाधीश नहीं बन सकता (No man shall be judge in his own case)
  2. कोई भी व्यक्ति  बिना सुने दोषी नहीं ठहराया जायेगा। (Nobody should be condemend unheard)
  3.  जो सुनवाई करेगा वही निर्णय करेगा।  (One who hear must decide.)
  4. पक्षों को जिरह करने का अवसर मिलना चाहिए।  (The parties should get an opportunity to cross-examine.)
1 . कोई भी व्यक्ति अपने ही मामले में न्यायाधीश नहीं बन सकता (No man shall be judge in his own case):
 नैसर्गिक न्याय का सिद्धांत यह कि हर व्यक्ति को न्यायालय से उसके मामले में  उचित और पक्षपातरहित न्याय मिले, न्यायाधीश का रुझान या झुकाव किसी भी पक्षकार के साथ नहीं होना चाहिए जो व्यक्ति किसी वादग्रस्त संपत्ति में  अपना हित रखता हो  वह न्यायाधीश उस वाद का निपटारा नहीं करेगा।  
कारण यह है कि मनुष्य चाहे जितना ही महान क्यों न हो पर वह व्यक्तिगत स्वार्थो से प्रभावित हो ही जाता है।  इसी  कारण  से किसी भी व्यक्ति से यह आशा नहीं की जा सकती की वह अपने मामले में स्वार्थरहित  होकर उचित और पक्षपातरहित न्याय कर सके।  
 इस न्याय के सिद्धांत को पछपात का सिद्धांत भी कहा जाता है।  न्यायधीश को निष्पछ हो कर न्याय करना चाहिए।  
पछपात तीन प्रकार के भी हो सकते है जैसे :
  1. आर्थिक पछपात 
  2. व्यक्तिगत पछपात 
  3. शासकीय पछपात
आर्थिक पछपात :
कभी कभी पछपात का यह कारण  भी होता है कि किसी मामले में न्यायधीश का हित निहित होता है।  जिस मामले का उसे निर्णय करना है. आर्थिक हित  चाहे अधिक  हो या कम , न्यायधीश को न्यायधिकरण का सदस्य बना रहने में अमान्य कर देता है।  
उदाहरण :यदि किसी बैंकिंग कंपनी का राष्ट्रीयकरण हो जाये और इसके ख़िलाफ कंपनी का कोई अंशधारी  वाद दायर कर दे तो ऐसा न्यायाधीश इस वाद का निर्णय नहीं कर सकता अगर न्यायधीश का  कंपनी में कोई अंश हो।

व्यक्तिगत पछपात:
व्यक्तिगत पछपात का सवाल तब  आता है जब किसी  न्यायाधीश की किसी  वाद में रूचि हो , क्योकि वाद प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सम्बन्ध  उसके  किसी रिश्तेदार या घनिष्ठ मित्र सम्बन्ध होता है।  
दाहरण: विशवविद्यालय में एक "प्रवक्ता " के पद के एक अभ्यर्थी ( candidate ) के बहनोई उस चयन समिति के सदस्य है , चूँकि चयन समिति का कार्य अर्धन्यायिक प्रकृति है इसलिए अभ्यर्थी के बहनोई उस चयन समिति में नहीं बैठ सकते।

शासकीय पछपात :
शासकीय पछपात उस समय होता है जब कोई उच्च उत्तरदायी प्रशासनिक अधिकारी किसी योजना का कार्य करता है और उस कार्य में उसकी व्यक्तिगत  रूचि प्रकट होने लगती है , ऐसा विशेष रूप से मंत्रियो के साथ होता है क्योकि वे ही योजना बनाते है और लागु भी कराते है।  

2 .कोई भी व्यक्ति  बिना सुने दोषी नहीं ठहराया जायेगा। (Nobody should be condemend unheard)
नैसर्गिक न्याय के सिद्धांत के अनुसार कोई भी व्यक्ति बिना सुने दोषी नहीं ठहरया जायेगा।  जिसका  साफ अर्थ है कि प्रत्येक व्यक्ति को अपनी सफाई प्रस्तुत करने का अवसर देना चाहिए।  नैसर्गिक न्याय के सिद्धांत का यह उदेश्य है कि कीसी निर्दोष , निरपराध व्याकरति को दण्ड न मिल पाये।  
इसके लिए यह जरुरी है कि 
प्रत्येक व्यक्ति को उसके ऊपर लगाए गए , आरोपों की सुचना दी जय।  
उसको यह अवसर दिया जाये कि वह अपने बचाव के लिए उचित साक्षी, अभिलेख  या अन्य किसी प्रकार के साक्ष्य को प्रस्तुत करे।   

 3 जो सुनवाई करेगा वही निर्णय करेगा।  (One who hear must decide.)
 जो सुनवाई करेगा वही निर्णय करेगा (One who hear must decide.) इस सिद्धांत का मतलब यह है कि जो व्यक्ति वाद  से सम्बंधित पक्ष और पक्षकारो के आरोपों और प्रत्यारोपों को सुनेगा, उस वाद से संबंधित अभिलेखों को देखेगा ,  क्योकि उस व्यक्ति उस वाद से सम्बंधित जानकारी अधिक होगी और वह उचित निर्णय कर सकेगा। जबकि एक व्यक्ति जिसने किसी वाद की कार्यवाही का खुद संचालन न किया गया हो वह उस वाद का सही से निर्णय नहीं  सकता है।  

4 .पक्षों को जिरह करने का अवसर मिलना चाहिए।  (The parties should get an opportunity to cross-examine.)
किसी भी वाद में पक्षों को जिरह करने का अवसर मिलना चाहिए। उसमे प्रस्तुत किये गये तथ्यों की सत्यता की परख करने का एक उचित अवसर होता है क्योकि प्रत्येक व्यक्ति अपनी अपनी तरफ से तथ्यों को प्रस्तुत करता है।  इस स्थिति  में जब तक एक दूसरे का  प्रतिपरीक्षण न कर ले  इस बात का अनुमान लगाना कठिन है कि कौन सा पक्ष सही या गलत।  इसका मतलब नैसर्गिक न्याय का सिद्धांत है कि प्रत्येक पक्षकार  को जिरह का अवसर(cross examination ) मिले।  

पंजाब रज्य बनाम दिवान चुन्नी लाल A I R . 1970 SC , 086 के वाद में एक पुलिस दरोगा पर अकुशलता और बेईमान होने का आरोप लगाया गया।  उस दरोगा को सफाई देने का मौका तो दिया गया परन्तु जिरह करने की अनुमति नहीं दी गई।  उच्चतम न्यायालय ने ये  निर्णय किया कि जिरह करने की अनुमति न देना नैसर्गिक न्याय के सिद्धांत का उल्लंघन है।  इस कारण से दरोगा के खिलाफ की गई कार्यवाही उच्चतम न्यायालय द्वारा रद्द कर दी गई।  










नैसर्गिक न्याय के चार सिद्धान्त।(Four principles of natural justice) नैसर्गिक न्याय के चार सिद्धान्त।(Four principles of natural justice) Reviewed by Lawyer guru ji on सोमवार, अक्तूबर 09, 2017 Rating: 5

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