नैसर्गिक न्याय के नियमों का अपवाद(The exception of Rules of natural justice)

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नैसर्गिक  न्याय के नियमों का अपवाद(The exception of Rules of natural justice)
नैसर्गिक  न्याय के नियमों का अपवाद(The exception of Rules of natural justice)


प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत के 4 नियम है जिनको ध्यान में रख कर न्यायालय में जो वाद आते है उनपर  उचित और पक्षपातरहित न्याय दिया जाता है।

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नैसर्गिक न्याय के चार सिद्धांत का मतलब यह की  अगर  किसी भी व्यक्ति के खिलाफ कोई कार्यवाही होती है , तो उस कार्यवाही पे आदेश करने से पहले उस व्यक्ति को यह अवसर प्रदान करना चहिए कि वह अपने पक्ष के समर्थन में सबूत और तर्क प्रस्तुत कर सके, उसे सुनवाई का मौका दिया जाये ताकि उस व्यक्ति को उचित और पक्षपातरहित न्याय मिले।    

अब हम बात करने जा रहे है कि नैसर्गिक न्याय के सिद्धांत (Principle of natural justice) किन परिस्थितयों में नहीं लागु  हैं।  

  1.  विधायी कार्यो में अपवर्जन।  (Statutory Exclusion.)
  2. आपातकालीन के समय अपवर्जन। (Exclusion in Emergency.)
  3. लोकहित में अपवर्जन।  (Exclusion in Public Interest.)
  4. अव्यवहारिकता में अपवर्जन।  (Exclusion in Impracticability.)
  5. शैक्षिक मूल्यांक में अपवर्जन।  (Exclusion in academic evalution)
  6. अंतरिम अनुशासनिक कार्यवाही में अपवर्जन। (Exlcusion in Interim Disciplinary action)
 विधायी कार्यो में अपवर्जन (Statutory Exclusion.)
नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों के नियम विद्यायी कार्यो में नहीं लागु होते जब प्रशासनिक कार्य विधायी कार्य के रूप में निरूपित  किया जाता हैं।  यह सार्वभौमिक रूप से जाना जाता है कि  प्रशासनिक प्राधिकारी नियमो के  बनाने में नोटिस और सुनवाई प्रदान करने के हेतु बाध्य नहीं है जब तक कि कानून द्वारा उनके लिए व्यवस्था नहीं की जाती हैं, लेकिन कठिनाई तब उठती है जब  आदेश सरकार द्वारा जारी किये जाते है।  
यदि आदेश प्रशासन द्वारा जारी किये जाते हैं  तब तो सुनवाई का नियम तो  लागु होता हैं, लेकिन यही आदेश अगर विधायी है तो सुनवाई का नियम नहीं लागु होगा। 

आपातकालीन के समय अपवर्जन (Exclusion in Emergency.)
मनैसर्गिक न्याय के सिद्धांत आपातकालीन स्थिति में नहीं लागु होते हैं। कारण यह हैं कि राष्ट्रीय आपात में व्यक्तियों के  खतरनाक क्रिया कलाप  के संदेह के कारण बिना सुनवाई के ही राष्ट्रीय को बाहरी आक्रमण से बचाने  के लिए इन नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतो पर रोक लगाया जा सकता हैं। 

लोकहित में अपवर्जन।  (Exclusion in Public Interest.)
नैसर्गिक न्याय के सिद्धांत लोक कल्याण के हित के समय नहीं लागु होते हैं। सुचना और सुनवाई के आग्रह को रोका जा सकता है जहाँ लोक सुरक्षा, लोक  स्वास्थ्य , या लोक नैतिक की   आती है  उस समय कार्यवाही की अपेक्षा तुरंत की जाती है।  
जैसे :
आग को  बुझाने के लिए सम्पत्ति को गिराना  ,संक्रामक पौधे और पशु जीवन का नाश करना तथा अस्वास्थ्य कर खाद्य समाग्री का विनाश करना  अदि ऐसी बातें है जिसमे कार्यवाही  सुचना और सुनवाई प्रदान किये बिना ही करनी पड़ती हैं।  
अव्यवहारिकता में अपवर्जन।  (Exclusion in Impracticability.)
नैसर्गिक न्याय के नियमो को लागु करने में न्यायिक नजरिया सिद्धांत पक्ष पर ही नहीं  बल्कि व्यवहार पक्ष पर भी ध्यान रखता  हैं।  जहाँ सम्बंधित व्यक्तियों की संख्या बहुत ज्यादा होती हैं , वहाँ न्यायालय सबको सुनवाई का अवसर प्रदान  नहीं करता है।  

आर० राधाकृष्णन बनाम उस्मानिया विशविद्यालय ,AIR 1974 AP 238  मामले में विशविद्यालय ने सारी MBA की प्रवेश परीक्षा रद्द कर दिया था, कारण यह था की सभी अभ्यर्थी  सामूहिक नकल करते पकड़े गए । जहाँ न्यायालय ने यह निर्णय किया कि ऐसी स्थिति में जहाँ बहुत ज्यादा संख्या में अभ्यर्थियों के द्वारा नकल  हुई हैं  वहाँ सभी अभ्यर्थियों को सुचना और सुनवाई का अवसर प्रदान करना असंभव था। 

शैक्षणिक  मूल्यांक में अपवर्जन।  (Exclusion in academic evalution)
शैक्षणिक मूल्यांक के कारण यदि किसी वद्यार्थी को किसी  शिक्षण संस्था से निकाला जाता है तो ऐसे मामले में नैसर्गिक न्याय के नियमो का सहारा नहीं लिया जा सकता हैं।

अंतरिम अनुशासनिक कार्यवाही में अपवर्जन। (Exlcusion in Interim Disciplinary action)
जहाँ अनुसाशिक कार्यवाही निवारक प्रकृति की होती है वहाँ नैसर्गिक न्याय के नियमो को लागु होने से अपवर्जित किया  जा सकता है।  
नैसर्गिक न्याय के नियमों का अपवाद(The exception of Rules of natural justice) नैसर्गिक  न्याय के नियमों का अपवाद(The exception of Rules of natural justice) Reviewed by Lawyer guru ji on मंगलवार, अक्तूबर 10, 2017 Rating: 5

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