प्रत्येक व्यक्ति को इन 6 अधिकारों के बारे में पता होना चाहिए जो भारत के संविधान द्वारा प्रदान किये गए है।

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प्रत्येक व्यक्ति को इन 6 अधिकारों के बारे में पता होना चाहिए जो भारत के संविधान द्वारा प्रदान किये गए  है।

भारतीय संविधान के तीसरे भाग में , नागरिको के मौलिक अधिकारों के बारे में विस्तार से  बताया गया है।  किसी भी नागरिक के नैतिक, भौतिक और आध्यात्मिक विकास के लिए मौलिक अधिकार बहुत ही आवश्यक हैं। जिस तरह से जीवन जीने के लिए रोटी कपड़ा और माकन की जरूरत होती है उसी तरह हर नागरिक के विकास के लिए मौलिक अधिकारों की जरुरत होती है। इन सब बातो को ध्यान में रखते हुए भारतीय संविधान ने मौलिक अधिकारों को 6 भागो में विभाजित किया है।

भारतीय संविधान में मौलिक अधिकार कहाँ से लिए गए है? 
भारत सरकार अधिनियम 1935, ने संघीय प्रणली की सुविधा के साथ के साथ भारत के संविधान का आधार बनाया गया था। भारतीय संविधान के निर्माण के समय उसमे और कुछ विशेषताओ को जोड़ने के लिए के लिए भारत सरकार  ने अपने पड़ोसी देशो से उनके संविधान से कुछ विशेषताओ को  लिया गया है। 
जैसे संयुक्त राज्य अमेरिका के संविधान से मौलिक अधिकारों को  लिया गया है।

भारतीय संविधान द्वारा प्रदान किये गये 6 मौलिक अधिकार।  (6 Fundamental Rights provided by the Indian Constitution). 


1. समानता का अधिकार (अनुछेद 14-18)
2. स्वतंत्रता का अधिकार (अनुछेद 19-22)
3. शोषण के विरुद्ध अधिकार (अनुछेद 23-24)
4. धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार (अनुछेद  25-28)
5. संस्कृति और शिक्षा से सम्बद्ध अधिकार (अनुछेद 29-30)
6. सांवैधानिक उपचारों का अधिकार (अनुछेद (Article 32).

मौलिक अधिकारों के तहत यह बताया गया है कि वे सब कानून , जो संविधान के प्रारंभ होने से पहले भारत में लागु थे , उन कानूनों के वे सभी भाग वैसे ही लागु रहेंगे परन्तु ये सब कानून भारतीय संविधान के मायने में उचित हो। जिसका अर्थ यह कि राज्य के द्वारा ऐसा कोई भी कानून नहीं बनाया जायेगा तो की भारतीय नागरिको के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता हो।

भारतीय संविधान में  राज्य शब्द से यह तात्पर्य है -संघ सरकार, राज्य सरकार दोनों से है।

संपत्ति का अधिकार (अनुच्छेद 31)
1978 में भारतीय संविधान के 44  संशोधन में  संपत्ति का अधिकार (अनुच्छेद 31) को मौलिक अधिकारों से हटा दिया गया और संपत्ति का अधिकार को भारतीय संविधान के अनुछेद 300 A  के तहत इसे कानूनी अधिकार बना दिया गया है।  

अब आपको इन अधिकारों के बारे में हम विस्तार से बतायेंगे।

1.समानता का अधिकार(Right to equality)
भारतीय संविधान के द्वारा भारतीय नागरिको को कुछ अधिकार प्रदान किये गए है जिसमे से एक है समानता का अधिकार। इस समानता के अधिकार को प्रदान करने का मुख्य उदेश्य यह है कि भारतीय नागरिको के साथ किसी भी प्रकार का कोई भी भेद भाव न हो सके। यहाँ भेदभाव से मतलब यह कि राज्य की ओर से किसी भी नागरिक के साथ किसी भी आधार पर भेद भाव नहीं किया जाएगा जैसे ;
किसी भी व्यक्ति को उसके धर्म, वर्ण , जाति, लिंग, या जन्म स्थान के आधार पर किसी भी प्रकार कोई भेद भाव नहीं किया जायेगा और न ही उसे किसी लाभ से वंचित नहीं किया जायेगा। 
 राज्य के समक्ष सभी नागरिक एक सामान है उनके साथ एक जैसा ही व्यव्हार किया जायेगा।
लेकिन राज्य को एक विषेश अधिकार दिया जिसमे राज्य  के स्त्रियों, बच्चों तथा पिछड़े वर्ग के लोगों के लिए विशेष सुविधा के नियम बनाने का अधिकार दिया गया है।  


अनुछेद 14 विधि के  समक्ष समानता। (Article 14 Equality before the law. )
भारतीय संविधान के अनुसार  विधि के  समक्ष समानता से यह तात्पर्य  है राज्य की तरफ से  धर्म, वर्ण , जाति, लिंग, या जन्म स्थान के आधार पर कोई भेद भाव नहीं किया जायेगा। हर भारतीय नागरिक को  विधि के समक्ष सामान  संरक्षण प्रदान किया जायेगा। विधि के समान  संरक्षण से किसी भी  भारतीय नागरिक को वंचित नहीं किया जायेगा।

(b).अनुच्छेद 15 धर्म, जाति, वर्ण, लिंग, या जन्म के स्थान पर भेदभाव का निषेध। (Article 15 Prohibition of discrimination on the ground of religion, caste, race, sex, or place of birth.)
भारतीय संविधान के अनुसार धर्म, जाति, वर्ण , या जन्म के स्थान पर भेदभाव का निषेध से यह तात्पर्य  है राज्य की तरफ से  धर्म, वर्ण , जाति, लिंग, या जन्म स्थान के आधार पर कोई भेद भाव नहीं किया जायेगा।
 भारतीय संविधान के अनुसार किसी भी नागरिको से इस  आधार पर भेद भाव नहीं किया जायेगा  और न ही उनको किसी कार्य को करने से रोका जायेगा और  न ही किसी स्थान में आने जाने से रोका जायेगा। जेसे :

दुकानों, सार्वजानिक भोजनालयो, होटल और सार्वजानिक मनोरंजन के स्थान में प्रवेश करने से नहीं रोका जायेगा।
पुर्णतः या भागतः  राज्य निधि से पोषित सधारण जनता के इस्तेमाल के लिए कुआ ,जलासय , स्नान घाट, तालाबो और सार्वजानिक समागम से स्थानों के इस्तेमाल से नहीं रोका जा सकता ।

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अनुच्छेद 16 सार्वजनिक रोजगार के मामले में अवसर की समानता। (Article 16  Equality of opportunity in matters of public employment.).
भारतीय संविधान के अनुसार सार्वजनिक रोजगार के मामले में अवसर की समानता से यह तात्पर्य  है राज्य की तरफ से  धर्म, वर्ण , जाति, लिंग, या जन्म स्थान के आधार पर कोई भेद भाव नहीं किया जायेगा।सार्जनिक रोजगार के मामले राज्य के अधीन किसी भी पद पर नियोजन या नियुक्ति के सम्बंधित विषयों में किसी भी नागरिक से भेद भाव नहीं  किया जायेगा हर नागरिक को  रोजगार के मामले में समानता दी जाएगी। 

  राज्य के अधीन किसी भी कार्यालय से संबंधित नियुक्ति में भारत के सभी नागरिकों के लिए एक समान अवसर होना चाहिए।

राज्य के तहत किसी भी रोजगार या कार्यालय के संबंध में कोई भेदभाव नहीं होगा।

इस अनुच्छेद में कुछ भी संसद को किसी राज्य या संघीय क्षेत्र के भीतर किसी भी स्थानीय या अन्य प्राधिकरण के कार्यालय में नियुक्ति के संबंध में, किसी भी प्रावधान को निर्धारित करने से नहीं  रोकेगा।  

इस अनुछेद के अनुसार राज्य को ऐसे प्रावधान बनाने से नहीं रोकेगा जो  कि नागरिकों के किसी भी पिछड़े वर्ग के पक्ष में नियुक्तियों या पदों के आरक्षण के लिए कोई प्रावधान बनाया जाना है।  

इस अनुछेद के अनुसार राज्य को ऐसे प्रावधान बनाने से नहीं रोकेगा जो  की  नागरिकों के किसी भी पिछड़े वर्ग  पदोन्नति के परिणामस्वरूप, अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के अधीन सेवाओं में किसी श्रेणी या पदों के पद के लिए पदोन्नति के मामले में राज्य के वरिष्ठता के साथ आरक्षण के लिए कोई प्रावधान बनता है।
अनुच्छेद 17 अस्पृश्यता का उन्मूलन (Article 17  Abolition of Untouchability)- 
भारतीय संविधान द्वारा अस्पृश्यता का अंत कर दिया गया है। अगर इससे हुई किसी निर्योग्यता को लागु  करना संविधान और कानून दोनों की नजरो में यह अपराध होगा जो की विधि के अनुसार दंडनीय होगा।

अस्पृश्यता का अंत करना बहुत जरुरी था क्योकि लोगो से इस आधार पर भेद भाव किया जाता था की ये अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों में से है।


अनुच्छेद 18 उपाधियों का अंत (Article 18 Abolition of titles) 
- भारतीय संविधान के अनुसार उपाधियों का अंत से यह तात्पर्य है कि राज्य , सेना या विद्या से सम्बंधित सम्मान के सिवाय और कोई भी उपाधि नहीं प्रदान नहीं करेगा।

भारत में रहने वाला कोई भी नागरिक किसी भी विदेशी राज्य से किसी भी प्रकार की कोई भी उपाधि स्वीकार नहीं करेगा।
वह व्यक्ति जो भारतीय नागरिक नहीं है , राज्य के अधीन किसी भी लाभ या भरोसे के किसी पद को धारण करते हुए किसी विदेशी रज्य से कोई उपाधि  राष्ट्रपति  की सहमती के बिना नहीं स्वीकार करेगा।

राज्य के अधीन किसी भी लाभ या भरोसे के किसी पद को धारण करते हुए किसी विदेशी रज्य से या उसके अधीन किसी रूप में कोई भेंट ,कोई उपाधि को  राष्ट्रपति   की सहमती के बिना नहीं स्वीकार करेगा।

यह भी पढ़े :भारतीय संविधान में वर्णित पाँच न्यायिक रिट(Type of writ under the Constitution of India.)


2. स्वतंत्रता का अधिकार (Right to freedom)
(a).अनुच्छेद 19 भाषण आदि की स्वतंत्रता के संबंध में कुछ अधिकारों का संरक्षण।(Article 19 Protection of certain rights regarding freedom of speech etc.)-भारतीय संविधान के अनुसार भाषण आदि की स्वतंत्रता के संबंध में कुछ अधिकारों का संरक्षण से यह तात्पर्य  है राज्य की तरफ से  धर्म, वर्ण , जाति, लिंग, या जन्म स्थान के आधार पर कोई भेद भाव नहीं किया जायेगा।  राज्य की नजर में सभी नागरिको को एक सामान माना गया है।
अनुच्छेद 19 कुछ अधिकारों के संरक्षण के बारे में जेसे: भाषण की स्वतंत्रता के बारे में जहां भारत के सभी नागरिकों का अधिकार है, लोकतंत्र में स्वतंत्रता को जीवन ही मन गया  है नागरिकों के विकास और स्थापना के लिए, यह आवश्यक है कि उन्हें लेखन, भाषण और उनकी भावनाओं को अभिव्यक्त करने की स्वतंत्रता दी जाये । उन्हें कम से कम राज्य सरकार द्वारा आश्वासन दिया जाना चाहिए कि उनकी दैनिक स्वतंत्रता अकारण अपहरण नहीं किया जायेगा.
  1. भारत के प्रत्येक नागरिक को भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार है।
  2. भारत के हर नागरिक को शांतिपूर्वक और हथियारों के बिना इकट्ठा करने का अधिकार है।
  3. भारत के हर नागरिक को संघों या संघ बनाने का अधिकार हैभारत के प्रत्येक नागरिक को भारत के पूरे क्षेत्र में स्वतंत्र रूप से जाने का अधिकार है।
  4. भारत के हर नागरिक को किसी पेशे में भाग लेने का अधिकार है और उसे किसी भी व्यवसाय या व्यापार को जारी रखने का अधिकार है।
  5. भारत के हर नागरिक को भारत के किसी भी हिस्से में रहने का अधिकार है और उसे भारत के क्षेत्र के किसी भी हिस्से में बसने का अधिकार है।
अनुछेद 20 अपराधो के लिए दोषसिद्ध के सम्बन्ध में संरक्षण  (Article 20 protection in respect of conviction for the offence.) 
भारतीय संविधान के अनुसार अनुचेद्द 20 अपराधो के लिए दोषसिद्ध के सम्बन्ध में संरक्षण प्रदान करता है।
कोई भी व्यक्ति किसी भी अपराध का दोषी नहीं माना जायेगा जब तक की उसका अपराध सिद्ध न कर दिया जाये।

1. किसी भी व्यक्ति को किसी अपराध के लिए दोषी नहीं ठहराया जाएगा, जब तक कि उसका अपराध सिद्ध न हो।

2. किसी भी व्यक्ति को एक ही अपराध के लिए मुकदमा चलाने और एक से अधिक बार दंडित नहीं किया जाएगा।

3 . किसी भी अपराध के आरोपी  व्यक्ति  को द के खिलाफ एक गवाह होने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता है।

अनुछेद 21 प्राण  और दैहिक स्वतंत्रता का संरक्षण (Article 21 Protection of life and liberty) 
 भारतोय  संविधान के अनुसार अनुछेद 21 प्राण  और दैहिक स्वतंत्रता का संरक्षण से  तात्यपर्य है  कि हर नागरिक के  जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के   संरक्षण का अधिकार प्रदान करता है।  किसी भी नागरिक को अपने जीवन या निजी  स्वतंत्रता से  वंचित नहीं किया जायेगा।

अनुछेद 21 के अंतर्गत प्रदान किये गए  जीवन के  अधिकार  में मृत्यु का अधिकार शामिल नहीं है मतलब मरने का अधिकार नहीं शामिल है।

अनुच्छेद 21 ए- शिक्षा का अधिकार(Article 21 A- Right to education.)
शिक्षा के अधिकार का मतलब है कि राज्य उन सभी बच्चों को मुफ़्त और अनिवार्य शिक्षा प्रदान करेगा जिनकी उम्र छह से चौदह वर्ष है, जैसा कि राज्य, कानून द्वारा निर्धारित किया जा सकता है।
  1. शिक्षा हर किसी के लिए सबसे महत्वपूर्ण है क्योंकि यह हमारे जीवन का एक खास  हिस्सा है।
  2. व्यक्तिगत, सामाजिक, आर्थिक और राष्ट्रीय विकास के लिए शिक्षा सबसे महत्वपूर्ण है।
  3. शिक्षा हर व्यक्ति को स्व-निर्भर करता  है जहां एक व्यक्ति स्थिति के अनुसार  खुद से र्णय ले सकता है।
  4. शिक्षा समानता स्थापित करती है क्योंकि यह लिंग और सामाजिक वर्गों के बीच मतभेदों को दूर करती  है।
  5. शिक्षित होने पर , आप लोगों के सामने आत्मविश्वास से अपने विचार और राय को व्यक्त कर सकते हैं और वे आपको गंभीरता से सुनते हैं
  6. शिक्षा समाज से गरीबी को दूर कर सकती है जहां एक शिक्षित व्यक्ति अपने कौशल और ज्ञान से आय अर्जित करता है।
  7. शिक्षा खाद्य सुरक्षा प्राप्त करने और पोषण को सुधारने के लिए कृषि को बढ़ावा देने में राष्ट्र की  मदद करती है।
  8. शिक्षा समाज में स्वस्थ रहने और बच्चे और मां की मृत्यु दर को कम करने में मदद करती है। और व्यक्ति को किसी भी बीमारी से बचाता है, और स्वास्थ्य समस्या को रोकती है ।
(d). अनुछेद 22 कुछ दशाओ में गिरफ़्तारी और निरोध से संरक्षण (Article 22 Protection against arrest and detention in the certain case.)   
अनुछेद 22 के अनुसार कुछ दशाओ में गिरफ़्तारी और निरोध से संरक्षण से तात्पर्य यह की किसी भी
व्यक्ति को जो पुलिस द्वारा गिरफ्तार किया गया है , ऐसी गिरफ़्तारी के कारण को तुरंत अवगत कराये बिना अभिरक्षा के निरुद्ध नहीं रखा जायेगा और उस व्यक्ति को अपने  रूचि के  विधि व्यवसायी से परामर्श करने से नहीं रोका जायेगा।  

 प्रत्येक व्यक्ति जो गिरफ्तार किया गया है और अभिरक्षा के निरुद्ध रखा गया है उस व्यक्ति को मजिस्ट्रेट के समक्ष 24 घंटे  के समय की भीतर पेश किया जायेगा।  ऐसी गिरफ़्तारी के स्थान से मजिस्ट्रेट के न्यायालय  तक यात्रा के लिए जरुरी समय को छोड़कर उस व्यक्ति को मजिस्ट्रेट के समक्ष 24 घंटे  के समय की भीतर पेश किया जायेगा

शोषण के विरुद्ध अधिकार (Right against exploitation)

अनुछेद 23 मानव के  दुर्व्यापार और बाल आश्रम का प्रतिषेध (Article 23 Prohibition of traffic in human being and forced labour-)
 भारतीय संविधान से अनुछेद अनुछेद 23 मानव के  दुर्व्यापार और बंधुआ मजदूर और बेगार पर पावंदी लगा दी गयी है 
अगर कोई भी व्यक्ति इस उपबंध का उल्लंघन करता है तो वह विधि के अनुसार दंडनीय होगा। 

'बेगार ' एक ऐसा अभ्यास है जहां कर्मचारी को 'मुफ्त' सेवा या 'मास्टर' के लिए नाममात्र पारिश्रमिक प्रदान करने के लिए मजबूर किया जाता है।

अनुछेद 24 कारखानों आदि में बालको के नियोजन का प्रतिषेध(Article 24 Prohibition of employment fo children in factories)
अनुच्छेद 24 कारखानों में बच्चों के रोजगार के प्रति निषेध का मतलब है कि चौदह वर्ष से कम उम्र के किसी भी बच्चे को किसी कारखाने या खान में काम करने के लिए नियोजित नहीं किया जाएगा या किसी अन्य खतरनाक रोजगार में नियोजित नहीं किया जायेगा।  

बाल श्रम निषेध और विनियमन अधिनियम, 1986 के अनुसार, यदि किसी व्यक्ति द्वारा किसी बालक को  कारखाने या व्यवसाय की प्रक्रिया में काम करने के लिए अनुमति देता है या कम में रखता है जो की ऐसा करना मना है। ऐसा करने वाले  कारावास की सजा दी जाएगी, जो न्यूनतम 3 महीने या रुपये 10000 का जुर्माना होगा।

यदि किसी व्यक्ति को दूसरी बार पकड़ा जाता है ताकि बच्चे को किसी फैक्ट्री या व्यवसायिक प्रक्रिया में काम करने की अनुमति मिल जाए, तो उसे कारावास की सजा दी जाएगी जो अधिकतम छह महीने होगी।

 धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार(Right to freedom of religion )
भारतीय संविधान के द्वारा भारत को  एक धर्मनिरपेक्ष राज्य घोषित किया गया है. Articles 25, 26, 27 और 28 में धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार के बारे बताया गया है।  राज्य में किसी भी धर्म को कोई विशेष प्रधानता नहीं दी जाएगी। भारत एक धर्मनिरपेक्ष राज्य है, धर्मनिरपेक्ष राज्य से तात्पर्य  धर्मविरोधी राज्य से नहीं होता है. अतः प्रत्येक व्यक्ति की आयनैतिकता और स्वास्थ्य को हानि पहुँचाये बिना हर नागेरिक को अपने धर्म का पालन  करने का सम्पूर्ण अधिकार है।

संस्कृति और शिक्षा सम्बन्धी अधिकार (Cultural & educational rights )
संविधान द्वारा भारतीय नागरिको की संस्कृति और शिक्षा को बचाने में महत्वपूर्ण कम किया है , अल्पसंख्यको की संस्कृति और शिक्षा से सम्बंधित हितो की रक्षा की व्यवस्था  की गयी है।  

अनुच्छेद 29 अल्पसंख्यक वर्गों के हितों  का संरक्षण (Article 29 Protection of interests of minorities)

भारतीय संविधान के अनुसार अल्पसंख्यक वर्गों के हितों  का संरक्षण से ह तात्पर्य  है भारत के राज्य क्षेत्र या
उसके किसी भी भाग में रहने वाले नागरिको के किसी अनुभाग को, जिसकी अपनी एक विशेष भाषा ,लिपि  या संस्कृति है , उसे  बनाये रखने का अधिकार है।

राज्य द्वारा चलाये जा रहे किसी को उसके धर्म , मूलवंश , जाती ,भाषा या इनमे से किसी भी आधार पर सिक्षा संस्थान में प्रवेश लेने से वंचित नहीं रखा जायेगा

अनुच्छेद 30 शैक्षिक संस्थानों की स्थापना और प्रशासन के लिए अल्पसंख्यकों का अधिकार(Article 30 Right of minorities to establish and administer educational institutions-)
अनुच्छेद 30 शैक्षिक संस्थानों की स्थापना और प्रशासन के लिए अल्पसंख्यकों का अधिकार  से तात्पर्य है की धर्म या भाषा पर आधारित सभी अल्पसंख्यक वर्गों  को अपनी  रूचि के अनुसार सिक्षा संस्थाओ की स्थापना करना और प्रशासन का अधिकार होगा।



संवैधानिक उपचारों का अधिकार(Right to constitutional remedies)
भारतीय संविधान में, उल्लंघन से मूलभूत अधिकारों की सुरक्षा के लिए व्यवस्था की गई है। संविधान के अनुसार, सर्वोच्च न्यायालय को मौलिक अधिकारों का संरक्षक माना गया है। मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए प्रत्येक नागरिक को सर्वोच्च न्यायालय से प्रार्थना करने का अधिकार है.

भारतीय संविधान अनुच्छेद 32 और अनुच्छेद 226,रिट  के माध्यम से उपचार प्रदान करती हैं। संविधान के अनुच्छेद 32 सर्वोच्च न्यायालय को यह शक्ति प्रदान करती हैं जबकि संविधान के अनुच्छेद 226 उच्च न्यायालय को इस प्रकार की प्रकृति में रुकती सहित विशेषाधिकारों को जारी करने का अधिकार देता है:
  1. बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus)
  2. परमादेश रिट (Mandamus)
  3. प्रतिषेध रिट (Prohibition)
  4. उत्प्रेषण लेख (Writ of Certaiorari)
  5. अधिकार पृच्छा (Quo Warranto)


प्रत्येक व्यक्ति को इन 6 अधिकारों के बारे में पता होना चाहिए जो भारत के संविधान द्वारा प्रदान किये गए है। प्रत्येक व्यक्ति को इन 6 अधिकारों के बारे में पता होना चाहिए जो भारत के संविधान द्वारा प्रदान किये गए  है। Reviewed by Lawyer guru ji on बुधवार, अक्तूबर 11, 2017 Rating: 5

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