भारतीय संविधान में वर्णित पाँच न्यायिक रिट(Type of writ under the Constitution of India.)

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भारतीय संविधान द्वारा प्रदान किये  गये 6 मौलिक अधिकारों में से एक मौलिक अधिकार, है जो संवैधानिक उपचारों का अधिकार(Right to constitutional remedies ) भी प्रदान करता है।  संविधान के अनुछेद 32 से अनुछेद 35 तक इसका उल्लेख किया गया है।  संविधान के भाग 3   में  मौलिक  अधिकारों का वर्णन किया गया है।  जेसे :
1. समानता का अधिकार।
2. स्वतंत्रता का अधिकार। 
3. शोषण के विरुद्ध अधिकार।
4. धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार। 
5. संस्कृति और शिक्षा से सम्बद्ध अधिकार।
6. सांवैधानिक उपचारों का अधिकार।

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ऊपर दिए अधिकारों का यदि राज्य के द्वारा उल्लंघन होता है तो राज्य के विरुद्ध  न्याय पाने के लिए भारतीय संविधान के अनुछेद 32 के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय में और भारतीय संविधान अनुछेद 226 के अंतर्गत उच्च न्यायालय में रिट (Writ) याचिका को दाखिल करने का अधिकार  हर नागरिक को भारतीय संविधान द्वारा प्रदान किया गया है।  

भारतीय संविधान में  निम्नलिखित आदेशों का उल्लेख।   (Types of writ issued by Court)
  1. बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus)
  2. परमादेश रिट (Mandamus)
  3. प्रतिषेध रिट (Prohibition)
  4. उत्प्रेषण लेख (Writ of Certaiorari)
  5. अधिकार पृच्छा (Quo Warranto)
ऊपर दिए गए निम्न आदेशों का एक एक कर के वर्णन यह करेंगे ताकि इन निम्नलिखित  को  सरलता से समझा जा सके।  
1. बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus)
बंदी प्रत्यक्षीकरण रिट उस अधिकारी के खिलाफ दायर की जाती है जो किसी व्यक्ति  को  बंदी बनाकर कर रखता है , यह रिट तब जरी की जाती है जब बंदी बनाने वाला अधिकारी उस व्यक्ति को कोर्ट में पेश नहीं करता है इस writ को जरी करके गिरफ्तार करने वाले पुलिस अधिकारी को यह आदेश दिया जाता है की वह गिरफ्तार व्यक्ति को न्यायालय (court) के समक्ष जल्द से जल्द पेश करे। 
इस रिट (writ) का उद्देश्य मौलिक अधिकारों में दिए गए दैहिक स्वतंत्रता के संरक्षण के अधिकारका अनुपालन करना है. 
बंदी प्रत्यक्षीकरण रिट (writ)के आदेश से किसी व्यक्ति के गैरकानूनी कारणों से हुई गिरफ़्तारी से रिहाई दिलाता है।  बंदी प्रत्यक्षीकरण आदेश एक आज्ञापत्र होता है जो  न्यायालय द्वारा उस पुलिस या अन्य राजकीय संस्था को आदेश देता है की उसके द्वारा गिरफ्तार व्यक्ति को न्यायलय के समक्ष पेश करे और उस गिरफ्तार व्यक्ति के ऊपर लगे आरोपों को न्यायालय के समक्ष बताये। 
व्यक्ति या तो स्वयं या फिर अपने सहयोगी (वकील) की मदद से अदालत से याचिका को प्राप्त कर सकता है।  


2.परमादेश रिट(Mandamus) 
परमादेश रिट(Mandamus) उस समय न्यायालय द्वारा जरी की जाती है जब कोई लोक अधिकारी अपने कर्तव्यों के पालन से इंकार कर देता है और उस जिसके लिए कोई अन्य विधिक उपचार न प्राप्त हो मतलब कोई कानूनी रास्ता न हो। परमादेश रिट के द्वारा किसी लोक पद में नियोजित अधिकारी के अलावा भी  किसी व्यक्ति,  कनिष्ठ न्यायालय, सरकार या निगम के अधिकारी को भी यह आदेश    दिया जा सकता है कि वह उसे सौपें गए कर्तव्यों का पालन   सुनिश्चित करे।  इसका मुख्य उदेश्य है मौलिक अधिकारों की सुरक्षा की जा सके।
भारतीय सवैधानिक विधि में परमादेश वहाँ न्याय के सामन्य लेख के रूप में  काम करता है , जहाँ किसी व्यक्ति को न्याय देने से इंकार किया जाता है या तो न्याय देने में देरी होती है।

3.प्रतिषेध रिट (Prohibition)
प्रतिषेध रिट (Prohibition) किसी उच्चतर न्यायालय द्वारा अधिनस्थ्य न्यायालय के खिलाफ या अर्धन्यायिक अधिकरणों  को जरी की जाती है। इस रिट writ को जरी करने का उदेश्य  यह की अधिनस्थ्य न्यायलय  अपनी अधिकारिता से बाहर कोई कार्य न करे।  इस रिट के माध्यम से उच्चतर न्यायालय द्वारा अधिनस्थ्य न्यायालय को किसी मामले में  तुरंत कार्यवाही शुरू करे और की गयी कार्यवाही की सुचना उपलब्ध  करने का आदेश देती है।

4.उत्प्रेषण रिट (Writ of Certaiora)
उत्प्रेषण रिट  (Writ of Certaiorar) को भी उच्चतर  न्यायालय या उच्च  न्यायालय द्वारा अधिनस्थ्य न्यायालय के खिलाफ जरी किया जाता है।  इस रिट की जरी करके के अधिनस्थ्य न्यायालय को यह निर्देश दिया जाता की अपने पास रखे मुकदमो के निर्णय लेने के लिए उन मुकदमो को वरिष्ठ न्यायालय या उच्चतर न्यायालय को भेजे।  उत्प्रेषण रिट का उदेश्य यह है की च्चतर न्यायालय द्वारा अधिनस्थ्य न्यायालय में चल रहे किसी भी मुकदमो के प्रलेख (document) की समीक्षा (review) मात्र करना है।  इसका मतलब यह नहीं है कि उच्चतर न्यायालय अधिनस्थ्य न्यायालय के निर्णय के खिलाफ हो।
उत्प्रेषण रिट  उस प्राधिकारी के विरुद्ध भी जरी हो सकती है जो अधिकारिता के भीतर कार्य तो कर रहा है परन्तु उसने नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों के विरुद्ध  जा कर कार्य  किया हो |

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5.अधिकार पृच्छा (Quo Warranto)
अधिकार पृच्छा (Quo Warranto) रित ऐसे व्यक्ति के विरुद्ध जरी की जाती है जो किसी ऐसे लोक पद को धारण करता है जिस पद को उसे धारण करने का अधिकार नहीं है।  अधिकार पृच्छा  रिट के माध्यम से, न्यायालय  लोकपद पर किसी व्यक्ति  के दावे   कि वैधता की जाँच कर सकता है, यदि उस व्यक्ति का दावा निराधार है तो उस व्यक्ति को उस लोक पद से उसका निष्कासन कर  दिया जाता है।
इस रिट के द्वारा न्यायालय किसी भी लोक पद पर नियुक्त अधिकारी से यह सवाल पूछ  सकता है कि वह उक्त कार्य को किस अधिकारिता से कर रहा है यदि न्यायालय को जरा सा भी संदेह होता है की यह कार्य अनुचित  नहीं है तो न्यायालय इस कार्य को करने पर रोक भी लगा सकती है। 
भारतीय संविधान में वर्णित पाँच न्यायिक रिट(Type of writ under the Constitution of India.) भारतीय संविधान में वर्णित पाँच न्यायिक रिट(Type of writ under the Constitution of India.) Reviewed by Lawyer guru ji on रविवार, अक्तूबर 08, 2017 Rating: 5

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